किरायेदार।

किरायेदार। (The Tenants)

बहुत कुछ है मुंबई में देखने के लिए।
कहाँ कहाँ नज़र डाले?
पर सबसे रोचक है इनमें किराए पर रहने वाले।

हर अंतराल पर मिलेंगे,
ये सपनें देखने वाले।
कोई अपने छोटे से मकान में,
तो कोई बड़े से टावर में।

अपने जीवन को समायोजित करना,
कोई इनसे सीखे।
इन जैसे हालात से लड़ने वाले,
मुझे सिर्फ किताबों मे ही दिखे।

मकान बदलते वक़्त
एक ही सपना रहता है हर एक का।
अगला घर अपना खुद का हो,
ना की किसी और का।

किराया देना कोई बड़ी बात नहीं।
चंद पैसे ही जाते है जेब से।


पर जब जुड़े रिश्तों से जाना पड़ता है दूर,
तब एक आह सी निकलती है मन से।

रिश्ते सिर्फ इंसानों से तो नहीं बनते।
बेजुबां पशु पक्षी और लहलहाते पेड़ों से भी तो,
दिल है जुड़ जाते।

कम्बख्त दिल को समझाना,
बड़ा मुश्किल होता है।
रिश्ता जोड़ने से पहले,
दिल दिमाग को थोड़े ही पूछता है।

ज़िन्दगी का एक हिस्सा,
उस घर को दे देते हैं हसकर।


कितना अजीब लगता है।
वहां से हमेशा के लिये चले जाना,
महज़ एक ताला लगाकर।

उस घर में बंद हो जाती है,

अनगिनत शिकायतें।
कुछ खूबसूरत लम्हें।
दो एक समारोह, त्यौहारों का जश्न।


और बोहोत सारी यादें।
अपना खुद का घर मिलने के लिए की गयी,
उस ऊपरवाले से अधूरी फरियादें।

जिसे यहाँ वहां घूमने का शौक हो,
वह सैलानी कहलाता है।


पर जो ये मजबूरी में करे,
वह किराएदार कहलाता है।

सबसे मजबूर वो होता है,
जो पसीना बहाकर तनख्वाह तो पाता है।


पर उस तनख्वाह का एक बड़ा सा हिस्सा,
किराए में हीं कट जाता है।

मेरी ईश्वर से एक ही प्रार्थना है।
की हर एक का खुद का घर हो इस दुनिया में।


ताकि घर में छोटा सा बदलाव करते समय,
मकान मालिक क्या कहेगा?
ये सवाल ना उठे किसी के मन में।

-हेमा

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