मकर संक्रांति

Makar Sankranti (मकर संक्रांति)

नन्हा पंछी बोला अपने माता पिता से,
पहले अपने दाना खाने की ज़मीन ले ली।


फिर ज़मीन के भाइयों को बेघर किया,
अब इन जान लेवा मांजो से त्यौहार मना रहे है।


अब बस माँ, बेरेहम जल्लाद बोहोत देख लिए।
इंसानों से मिलने हम कब जा रहे है?

सुना है इंसान बड़े समझदार होते है।

फिर ये जल्लाद कौन है, जो खुले आम मांजे लेकर इस तरह घूम रहे है।


चाँद पर भी जा पहुंचा है इंसान।
फिर ये राक्षस कौन है?
जो अपने ज़मीनी भाइयों को नुक्सान पहुंचा रहे है सर ए आम?

तुम कहती थी ना माँ, इंसान सोच सकते है।
फिर ये कौन है जो जानते हुए भी मांजे जैसी खतरनाक चीज़ को आसामनों में उड़ा रहे है?

ये जल्लाद तो हमारे भाइयों की जान लेकर, मिठाई लड्डू खा रहे है।
माँ, इंसानों से मिलने हम कब जा रहे है?

आज संक्रांति है,
मुझे भी अपने दोस्तों से मिलने जाना है।

आप तो मुझे इन्सानों से मिला नहीं रहे, वो ज़रूर मिलाएंगे।
फिर इंसान इन जल्लादों को कम से कम इतनी समझ तो देंगे।

की मज़े करने के लिए किसी जान से खेलना क्या सही है?
जो इस बात को समझे, इंसान वही है।

चलो ना माँ, जल्लादों की बस्ती से बोहोत दूर।
जहाँ ना हम, ना हो हमारे ज़मीन के भाई मजबूर।

उसके माता पिता एक दुसरे को देखकर मौन हो गए।
क्या जवाब दे इस नादान को, ये सोचते रह गए।




दूर एक बच्चा पंछीयों को दाना खिला रहा था।
माँ ने सोचा, शायद इसके माँ बाप ने इसे जल्लाद नहीं, इंसान बनाना चाहा था।

बोहोत सोच विचार के माँ बोली,
संक्रांति हो या दीवाली और होली।

इंसान तुम्हें इन जल्लादों के बीच ही मिलेंगे।
बस उन्हें पहचानने में तुम्हे सालों लग जाएंगे।

जो अपने मज़े और ख़ुशी के लिए दूसरों को तकलीफ दे, वो जल्लाद है।
वो देख वहां, मांजे में फँसे हुए भाई को आजाद कर रहा है, वही इंसान है।

ज़मीन के भाइयों को रोटी खिला रहा है ना वहाँ,
ऐसे इंसान भी होते हैं, जल्लाद रहते हैं जहाँ।

जिसमें इंसानियत और दया बाकी, वो जल्लाद नहीं कहलाता।
इंसान से मिलने के लिए, कहीं और जाना नहीं पड़ता।

जल्लाद और इंसान एक ही शरीर में रहते है।
किसे ज़िंदा रखना है, ये खुद वही तय करते है।

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